विकाशील देशों की एक बड़ी समस्या हैं बढ़ते कूड़े के ढेर। जैसे-जैसे देश विकाश की ओर अग्रसर होता है वैसे-वैसे कूड़े के ढ़ेर बढते जाते है। पहले जमाने में कूड़ा जैविक होता था जो आसानी से गल जाता था। आज देश में रसायनिक अपशिष्ट पदार्थ एवं प्लास्टिक की थैलियों के अंबार जगह-जगह देखने को मिलते है जिनका निस्तारण करना उतना आसान नही। पर्यावरण में जहरीली हवा बह रही है। जल श्रोतों के पास फैली गंदगी से जल दूषित होता जा रहा। नदियां का अस्तित्व दिन प्रतिदिन खतरे में पड़ता जा रहा है। गांधी जी के जन्मदिन 02 अक्टूबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वच्छ भारत अभियान चलाया गया। जिसका उद्देश्य गांव-शहर की गलियों का साफ-सुथरा रखना है। फैल रही गंदगी को साफ कराना सिर्फ सरकार का ही काम नही इसके लिये जब तक देश की जनता खुद बीड़ा नही उठाती कुछ नही होने वाला। लोगों को कूड़े से निजात दिलाने के लिये नगरपालिकाओं द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर जगह-जगह कूड़ेदान रखवाये। लेकिन वे कूड़ेदान लोगों के कूड़ा डालने के काम नही आते बल्कि वे सिर्फ कूड़ा डालने के एक केंद्र के रूप में स्थापित होकर रह गये है। जहां देखो वहां कूड़ा कूड़ेदान में नही बल्कि कूड़े का ढेर उसके आस-पड़ौस में लगा होता है। साफ करना तो छोड़ अगर लोग कूड़े को कूड़ेदान में डालना भी शुरू कर दें तो आधा अभियान तो इसी से सफल हो जाये। लेकिन आदत सिर्फ सरकार को कोसने की है न कि खुद की आदत सुधारने की। समाज अगर साफ सुथरा वातावरण चाहता है तो इसके लिये सरकार के भरोसे न रहकर खुद को भी कुछ करना होगा जिससे सरकार का भी प्रयास फलीभूत हो और पर्यावरण साफ सुथरा हो। हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट की स्टेट अॉफ ग्सोबल एयर 2018 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रदूषण से मरने वाले लोगों की संख्या विश्व में सबसे ज्यादा है। वहीं चीन इसमें दूसरे स्थान पर है। जब तक लोग पर्यावरण को लेकर सचेत नही होते प्रदूषण यूं ही सितम ढाता रहेगा।
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