शुक्रवार, 22 जून 2018

चलो मास कम्युनिकेशन ही कर लें

               

 

आज के दौर में बेरोजगारी की बीमारी कैंसर से कम नही। युवा परेशान हैं करें तो क्या करें। सरकारी नौकरी के लिये कोचिंग संस्थान भरे पड़े है।भीड़ के चलते अच्छे कैम्पस में दाखिला मिलना मुश्किल हो चला है। हर तरफ भीड़ है। हर क्षेत्र में कड़ी प्रतियोगिता है। कोर्स महंगे हो चलें है।नौकरशाही  में आरक्षण की मार है। ज्यादातर की संख्या में शिक्षा के क्षेत्र में लोगों का लक्ष्य निर्धारित नही हो पाता। हर कोई भेड़ चाल चल रहा है। मेरा सहपाठी यह कर रहा है मैं भी यही करूगां। कोई मतलब नही सहपाठी का हुनर  विद्यमान है या नही। एक समय था लोगों का आकर्षण डिग्रियों की तरफ ज्यादा था। आज के युवाओं का रूझान कोर्सेज की तरफ है। लोगों में दिन-प्रतिदिन शिक्षा के प्रति गम्भीरता की कमीं आती जा रही है। डिग्री और डिप्लोंमा हासिल करने भर से मतलब रह गया है। और यही सारी बीमारी की जड़ है। कुछ साल पहले युवाओं में मैनेजमेंट कोर्सेज की बहार थी। कोर्स की डिमांड को देखते हुए जगह-जगह इतने सेल्फ फाइनेंस कॉलेज खुल गये कि मैनेजमेंट डिग्री डिप्लोमा प्रसाद की तरह बांटे जाने लगे। परिणाम फ्लॉप होना कोइ अचंभे की बात नही। जब कुछ समझ नही आता तब सोचते है कि यार अब कुछ नही चलो मास कम्युनिकेशन ही कर लें। न मन में पत्रकारिता को लेकर कोई गम्भीरता न लोकहित की भावना। बस रोजगार ही तो चाहिये मास कम्युनिकेशन को लेकर यही धारणा बनती जा रही है।   यहां भी बेरोजगारी की समस्या में कुछ कमीं नही। जर्नलिज्म संस्थान हर साल हजारों की संख्या में हवाई पत्रकारों को जन्म दे रहे है। भारी-भरकम फीस चुकाने के बाद परिणाम वही ढाक के तीन पात। बड़े शहरों में खुलने वाले लोकल न्यूजपेपर टीवी व चैनल कम-से-कम सैलरी वाले मुलाजिमों से भरे पड़े है। लोगों के मन में भी पत्रकारों के प्रति सम्मान की भावना हृास होता जा रहा है। जिस कारण कभी भी टॉप पर रहने वाले किसी भी विद्यार्थी के मुंह से यह सुनने को नही मिलता कि मुझे एक पत्रकार बनना है। पत्रकारिता का रुतबा गुम होता जा रहा है। पत्रकारिता सिर्फ एक घाटे का व्यवसाय भर साबित होता जा रहा है।

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