मंगलवार, 26 जून 2018

भारत-सेशेल्स मिलकर एजम्प्शन आइलैंड पर बनायेंगे नौसैनिक अड्डा

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अफ्रीका के छोटे से देश जिबूती में चीन अपना सैन्य अड्डा स्थापित कर  चुका है। चीन के इस कदम को अफ्रीकी क्षेत्र में चीन की मौजूदगी दर्ज कराने के रूप मे देखा गया। 2015 में भारत ने भी अफ्रीकी क्षेत्र में अपने पैर जमाने की कोशिस करते हुए सेशेल्स के साथ एजम्प्शन आइलैंड पर नौसैनिक अड्डा परियोजना के लिये समझौता किया था लेकिन सेशेल्स विरोधी देशों के दबाव के चलते  इस परियोजना पर काम आगे नही बढ़ा पा रहा था। और कुछ दिन पहले ही सेशेल्स के राष्ट्रपति डैनी फॉर ने कह दिया था कि वह जब भारत जायेंगे तो इस मुद्दे पर बात नही करेंगे उस समय इसे चीन की जीत और भारत की हार के रूप में देखा गया। लेकिन भारतीय कूटनीतिज्ञयों द्वारा इस मुद्दे पर सेशेल्स को तैयार करके हारी हुई बाजी को पलटकर चीन को करारा जबाव दिया है। अब हिंद महासागर में शांति सुरक्षा और स्थिरता बढ़ाने के लिये सेशेक्स-भारत साथ मिलकर एजम्प्शन आइलैंड पर नौसैनिक अड्डा बनाने को तैयार है। जिसे मोदी सरकार की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है। इसी के चलते भारत ने सेशेक्स को 10 करोड़ डॉलर कर्ज और दूसरा डोर्नियर विमान देने का भी एलान किया है । दिये गये कर्ज से सेशेल्स अपनी समुद्री क्षमता बढ़ाने के लिये उपकरण खरीद सकेगा। इसके अलावा भारत सेशेल्स को तीन परियोजनाओं में वित्तीय मद्द करेगा जिनमें गवर्नमेंट हाउस, नया पुलिस मुख्यालय और अटॉर्नी जनरल कार्यालय शामिल है।

सेशेल्स के बारे में

सेशेल्स अफ्रीका का सबसे छोटा और सबसे कम आबादी वाला गणतांत्रिक देश है। यह 115 द्वीपों वाला एक द्वीप समूह है। जिसका क्षेत्रफल-451 वर्ग किलोमीटर (197 वाँ) 174 वर्ग मील और जनसंख्या 2005 की गणना के अनुसार 80,699 (205 वाँ) है। यह अफ्रीकी मुख्यभूमि से लगभग 1500 किलोमीटर (930 मील) दूर पूर्व दिशा मे और मेडागास्कर के, उत्तर पूर्व मे हिंद महासागर में स्थित है। इसके निकट के अन्य द्वीप देशों और क्षेत्रों मे पश्चिम में ज़ांज़ीबार, दक्षिण मे मॉरीशस और रीयूनियन, दक्षिणपश्चिम मे कोमोरोस और मयॉट और उत्तर पूर्व में मालदीव का सुवाडिवेस शामिल हैं। सेशेल्स मे अफ्रीकी महाद्वीप के किसी भी अन्य देश के मुकाबले सबसे कम आबादी है।  सेशेल्स की राजधानी विक्टोरिया एवं राष्ट्रपति डैनी फॉर है। राजभाषा- अंग्रेजी, फ्रांसीसी, सेशल्स क्रेयोल, मुद्रा-सेशेल्सी रूपया है।

जिबूती के बारे में

जिबूती पूर्वी अफ्रीका में बसा एक देश है, जिसकी सीमाएं उत्तर में इरीट्रिया से, पश्चिम और दक्षिण में इथियोपिया से और दक्षिण पूर्व में सोमालिया से मिलती है। इसके अलावा लाल सागर और गल्फ ऑफ अदन से मिलती देश की सीमाएं हैं। महज 23 हजार वर्ग किमी में फैले इस देश की आबादी पांच लाख से कुछ ज्यादा है। इसकी राजधानी जिबूती है। देश की आबादी का पांचवा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गरीबी रेखा के लिए तय 1.25 डालर प्रति दिन से कम आय अर्जित करता है। जिबूती की राजभाषा-अरबी, फ्रांसिसी, अफार और सोमाली और मुद्रा फ्रांक है। यह एक अर्द्ध अध्यक्षीय गणराज्य है। जिसके राष्ट्रपति-इस्माइल उमर गुलेह और प्रधानमंत्री-दैलिता मोहम्मद दैलिता है।   

   

सोमवार, 25 जून 2018

'मीसा कानून' इंदिरा गांधी का लोकतंत्र पर वार


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Maintenance of Internal Security Act 1971 - (MISA) आंतरिक सुरक्षा अधिनियम  1971 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरागांधी के कार्यकाल में संसद में पारित किया गया था। जिसके तहत किसी भी नागरिक को बिना किसी वारेंट, बिना न्यायालय परिक्षण के जेल में डाला जा सकता था। बाद में 1977 में मोरारजी देशाई की सरकार में इसे हटा दिया गया। 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977  देश में इंदिरा गांधी द्वारा लोकतंत्र पर वार करते हुए देश में आपातकाल घोषित करा दिया गया । इस दौर में मीसा कानून में कई बदलाव हुए। जिससे सरकार के हाथ में असीमित शक्तियां आ गयी।  जिसका जमकर दुरउपयोग किया गया। यह अधिनियम लोकतांत्रिक देश में हुई तानाशाही का एक प्रमाण था। जिसके अंतर्गत न जाने कितने निर्दोष लोगों को बेरहमी से कारागार में डाल दिया गया था। मीसा के तहत पुलिस द्वारा गिरफ्तार लोगों को न कोर्ट में पेश करने का कोई प्रावधान था और न ही जमानत की कोई व्यवस्था । जिस पर भी कांग्रेस विरोधी विचार रखने का शक गया उसी को जेल में डाल दिया गया। जिसमें कांग्रेस विरोधी पार्टियों के शीर्ष नेताओं को भी नही बख्शा गया। अटल बिहारी वाजपेई,जयप्रकाश नारायण, विजयाराजे सिंधिया, राजनारायण, मुरारजी देसाई, चरण सिंह कृपलानी, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, जार्ज फर्नांडीस,मधु लिमये,ज्योति बसु,समर गुहा, चंद्रशेखर बालासाहेब देवरस लालकृष्ण आडवानी, चंद्रशेखर, शरद यादव और  लालू प्रसाद को भी सलाखों को पीछे भेज दिया गया। प्रेस को भी अपने दवाब में ले लिया। प्रेस पर सेंसरसिप लगा दी गयी। सेंसरसिप के खिलाफ जो भी आवाज उठी उसे बल पूर्वक कुचल दिया गया। पुलिस की बर्बरता के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार नही था। समकालीन प्रसारण मंत्री वीसी शुक्ला बॉलीवुड में इंदिरा और केंद्र की प्रसंशा के गीत गाने का दबाव डाला गया। जानेमाने गायक किशोर कुमार ने जब इसके लिये मना किया तो रेडियो पर उनके गीतों का प्रसारण बंद करा दिया गया। उन घर पर इनकम टैक्स के छापे डलवाए गये। जनता ने इस सब का मूक जवाब 1977 के चुनाव में दिया और इंदिरा को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। आज भी 25 जून को काला दिवस के रूप में जाना जाता है।


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शुक्रवार, 22 जून 2018

कूड़ादान छोड़कर हर जगह कूड़ा


विकाशील देशों की एक बड़ी समस्या हैं बढ़ते कूड़े के ढेर। जैसे-जैसे देश विकाश की ओर अग्रसर होता है वैसे-वैसे कूड़े के ढ़ेर बढते जाते है। पहले जमाने में कूड़ा जैविक होता था जो आसानी से गल जाता था। आज देश में रसायनिक अपशिष्ट पदार्थ एवं प्लास्टिक की थैलियों के अंबार जगह-जगह देखने को मिलते है जिनका निस्तारण करना उतना आसान नही। पर्यावरण में जहरीली हवा बह रही है। जल श्रोतों के पास फैली गंदगी से जल दूषित होता जा रहा। नदियां का अस्तित्व दिन प्रतिदिन खतरे में पड़ता जा रहा है। गांधी जी के जन्मदिन 02  अक्टूबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वच्छ भारत अभियान चलाया गया। जिसका उद्देश्य गांव-शहर की गलियों का साफ-सुथरा रखना है। फैल रही गंदगी को साफ कराना सिर्फ सरकार का ही काम नही इसके लिये जब तक देश की जनता खुद बीड़ा नही उठाती कुछ नही होने वाला। लोगों को कूड़े से निजात दिलाने के लिये नगरपालिकाओं द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर जगह-जगह कूड़ेदान रखवाये। लेकिन वे कूड़ेदान लोगों के कूड़ा डालने के काम नही आते बल्कि वे सिर्फ कूड़ा डालने के एक केंद्र के रूप में स्थापित होकर रह गये है। जहां देखो वहां कूड़ा कूड़ेदान में नही बल्कि कूड़े का ढेर उसके आस-पड़ौस में लगा होता है। साफ करना तो छोड़ अगर लोग कूड़े को कूड़ेदान में डालना भी शुरू कर दें तो आधा अभियान तो इसी से सफल हो जाये। लेकिन आदत सिर्फ सरकार को कोसने की है न कि खुद की आदत सुधारने की। समाज अगर साफ सुथरा वातावरण चाहता है तो इसके लिये सरकार के भरोसे न रहकर खुद को भी कुछ करना होगा जिससे सरकार का भी प्रयास फलीभूत हो और पर्यावरण साफ सुथरा हो। हेल्थ इफेक्ट्स  इंस्टीट्यूट की स्टेट अॉफ ग्सोबल एयर 2018 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रदूषण से मरने वाले लोगों की संख्या विश्व में सबसे ज्यादा है। वहीं चीन इसमें दूसरे स्थान पर है। जब तक लोग पर्यावरण को लेकर सचेत नही होते प्रदूषण यूं ही सितम ढाता रहेगा।

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चलो मास कम्युनिकेशन ही कर लें

               

 

आज के दौर में बेरोजगारी की बीमारी कैंसर से कम नही। युवा परेशान हैं करें तो क्या करें। सरकारी नौकरी के लिये कोचिंग संस्थान भरे पड़े है।भीड़ के चलते अच्छे कैम्पस में दाखिला मिलना मुश्किल हो चला है। हर तरफ भीड़ है। हर क्षेत्र में कड़ी प्रतियोगिता है। कोर्स महंगे हो चलें है।नौकरशाही  में आरक्षण की मार है। ज्यादातर की संख्या में शिक्षा के क्षेत्र में लोगों का लक्ष्य निर्धारित नही हो पाता। हर कोई भेड़ चाल चल रहा है। मेरा सहपाठी यह कर रहा है मैं भी यही करूगां। कोई मतलब नही सहपाठी का हुनर  विद्यमान है या नही। एक समय था लोगों का आकर्षण डिग्रियों की तरफ ज्यादा था। आज के युवाओं का रूझान कोर्सेज की तरफ है। लोगों में दिन-प्रतिदिन शिक्षा के प्रति गम्भीरता की कमीं आती जा रही है। डिग्री और डिप्लोंमा हासिल करने भर से मतलब रह गया है। और यही सारी बीमारी की जड़ है। कुछ साल पहले युवाओं में मैनेजमेंट कोर्सेज की बहार थी। कोर्स की डिमांड को देखते हुए जगह-जगह इतने सेल्फ फाइनेंस कॉलेज खुल गये कि मैनेजमेंट डिग्री डिप्लोमा प्रसाद की तरह बांटे जाने लगे। परिणाम फ्लॉप होना कोइ अचंभे की बात नही। जब कुछ समझ नही आता तब सोचते है कि यार अब कुछ नही चलो मास कम्युनिकेशन ही कर लें। न मन में पत्रकारिता को लेकर कोई गम्भीरता न लोकहित की भावना। बस रोजगार ही तो चाहिये मास कम्युनिकेशन को लेकर यही धारणा बनती जा रही है।   यहां भी बेरोजगारी की समस्या में कुछ कमीं नही। जर्नलिज्म संस्थान हर साल हजारों की संख्या में हवाई पत्रकारों को जन्म दे रहे है। भारी-भरकम फीस चुकाने के बाद परिणाम वही ढाक के तीन पात। बड़े शहरों में खुलने वाले लोकल न्यूजपेपर टीवी व चैनल कम-से-कम सैलरी वाले मुलाजिमों से भरे पड़े है। लोगों के मन में भी पत्रकारों के प्रति सम्मान की भावना हृास होता जा रहा है। जिस कारण कभी भी टॉप पर रहने वाले किसी भी विद्यार्थी के मुंह से यह सुनने को नही मिलता कि मुझे एक पत्रकार बनना है। पत्रकारिता का रुतबा गुम होता जा रहा है। पत्रकारिता सिर्फ एक घाटे का व्यवसाय भर साबित होता जा रहा है।